विजय का पर्व ‘दशहरा’ और संघ का प्रादुर्भाव

रघुवीर सिंह Dussehra 2021/ सभी को विजयदशमी के पावन पर्व की हार्दिक मङ्‌गलकामनाएं। आश्विन मास की शुक्ल दशमी को आने वाले इस पर्व को अधर्म पर धर्म की, असत्य पर सत्य की और तमस पर प्रकाश की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। विजयादशमी के दिन ही प्रभु श्रीराम ने असुरों के राजा रावण को पराजित करके उसका वध किया और धर्म की स्थापना की। अज्ञातवास के पश्चात पाण्डवों ने इसी दिन शस्त्र पूजन करके पुनः शस्त्र धारण किए जिस कारण शस्त्र पूजन की परंपरा प्रारम्भ हुई। महाराणा प्रताप की दिवेर विजय भी इसी दिन हुई थी। महापराक्रमी हिन्दु योद्धा विक्रमादित्य हेमचन्द्र का जन्मदिवस भी आज के दिन है। छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा सीमोल्लंघन की परम्परा का प्रारम्भ भी इसी दिन हुआ। इस कारण आज के दिवस को विजय का पर्व भी कहते हैं।

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आज के दिन ही एक और विशेष कार्य हुआ था। परम पूज्य डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जी द्वारा सन् 1925 में नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई। मात्र कुछ युवाओं से शुरू हुआ यह संगठन वर्तमान में विशाल वट वृक्ष बन चुका है।

अब इस विषय पर बात करें कि संघ की आवश्यकता क्यों पड़ी..? क्या कारण थे जिनके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई..? इसके उत्तर हेतु हमें तनिक इतिहास का पुनरावलोकन करना होगा।

इतिहास का पुनरावलोकन करने पर ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद गुप्त वंश एक शक्तिशाली राजवंश हुआ जिसमें चन्द्रगुप्त द्वितीय हुए जिन्होंने शकों को पराजित कर विक्रम संवत प्रारम्भ किया और पुन: भारत भूमि को अखण्ड भारत बनाया। उनके पश्चात सम्राट हर्षवर्द्धन तक सब कुछ ठीक रहा लेकिन उनके पश्चात पुन: छोटी छोटी रियासतें बंट गई। 7 वीं शताब्दी में अरबी आक्रमण शुरू हो गए। तब बप्पा रावल ने समस्त स्थानीय राजाओं का संगठन बनाकर इस्लामी लुटेरों को वापिस अरब तक खदेड़ दिया और कालभोज की उपाधि धारण की। उनके पश्चात 200 वर्षों तक इस्लामी लुटेरों की हिम्मत ही नहीं हुई भारत की तरफ आने की। फिर 10 वीं शताब्दी में पुनः आक्रमण शुरू गए। उस समय सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने प्रयास किया कि सभी छोटी-बड़ी रियासतों का एकीकरण हो और एक भाक्तिशाली सेना का गठन हो किंतु उनका यह स्वप्न, स्वप्न ही रह गया। गौरी के छल के कारण पृथ्वीराज की पराजय होने से भारत का जैसे दुर्भाग्य ही जग गया हो । निरंतर 400 वर्षों तक इस्लामी आक्रांता भारत को लूटते- नोंचते रहे। मेवाड़ से मुखर प्रतिरोध प्रारम्भ हुआ जो कि कई अन्य जगह भी पहुंचा परन्तु परिणामों में विशेष परिवर्तन नहीं हो रहा था।

18वीं शताब्दी में महाराष्ट्र में वीर शिवाजी राजे ने योजनाबद्ध रूप से संगठन करके प्रतिरोध शुरू किया और हिंदू साम्राज्य की स्थापना करके छत्रपति की उपाधि धारण की। इसी मराठा साम्राज्य ने दिल्ली को इस्लामिक शासन से मुक्ति दिलाई किंतु दुर्भाग्य से उसके बाद अंग्रेज आ गए। उन्होंने तो अत्याचारों की पराकाष्ठा ही पार कर ली। भारत से 45 ट्रिलियन डॉलर सम्पदा लूट कर ले गए जिससे अर्थव्यवस्था के सिरमौर भारत में भीषण गरीबी और भूखमरी फैल गई। केवल भूखमरी देकर ही उन्होंने लगभग सवा तीन करोड़ भारतीयों के प्राण हर लिए। बाकी हत्याएं जो उन्होंने की उनकी वीभत्सता तो अकल्पनीय ही है।

अब प्रश्न यह है कि हम विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता हैं। इसाई केवल 2000 वर्ष पहले आए और इस्लाम तो मात्र 1400 वर्ष पहले ही आया जबकि हम तो 1 अरब 96 करोड़ वर्ष से इस पृथ्वी पर हैं। हमने संसार को अंतरिक्ष का ज्ञान करवाया । हमने संसार को आयुर्वेद का ज्ञान दिया। हमने विश्व को बतलाया कि वस्त्र भी होते हैं। मसालों का ज्ञान हो, अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान हो, योग-अध्यात्म का ज्ञान हो, कृषि का ज्ञान हो या फिर वास्तुकारी का ज्ञान हो सबकुछ हमने सिखाया ‘विश्व’ को, इसी कारण विश्वगुरू कहलाए। हम विश्व की अर्थव्यवस्था के तीन चौथाई के हिस्सेदार थे 10 वीं सदी तक। समृद्धि इतनी थी कि सोने की चिड़िया कहलाते थे। वीरता में हमारा कोई सानी नहीं था। फिर ऐसा क्या हुआ कि हम पूरे 800 वर्षों तक लुटते पिटते रहे ।

हमारे सर्वसम्पन्न होते हुए भी एक कमी थी। वह थी एकात्मता की, संगठन की। जिस कारण सब कुछ होते हुए भी हम इस्लामी लुटेरों से 650 वर्षों तक जूझते रहे। केवल संगठित नहीं होने की इतनी भारी कीमत चुकानी पड़ी हमको | हमारी माताओं-बहिनों को दो-दो दीनार में नीलाम किया गया विचार कीजिए कितना वीभत्स दृश्य होगा वह। लाखों नारियों को अपने सतीत्व की रक्षा हेतु अग्निकुण्ड में जीवित ही जलकर “जौहर” यज्ञ करना पड़ा। 4-5 वर्ष के लाखों अबोध बच्चों को भीषण अग्निकुण्ड में फेंक कर “शाका” करना पड़ा। लाखों नवजात शिशुओं को उछाल-उछाल कर भालों से छेद कर मार दिया गया। पता नहीं सांभाजी महाराज जैसे कितने ही हज़ारों पुरुषों को बीच से चीर दिया गया, किसी को खौलते तेल में डाल दिया गया। क्योंकि उन्होंने इस्लामी मजहब को स्वीकार नहीं किया। इन सब दृश्यों की कल्पना मात्र से ही तन-मन रो पड़ता है। सोचिए हमारे पूर्वज इन सब से 800 वर्षों तक संघर्ष करते रहे और हमें हिन्दू बनाए रखा, उनके साहस को देखिए। यदि उस समय सभी संगठित होकर प्रतिकार करते तो किसी में इतना साहस नहीं होता कि भारत भू की ओर कुदृष्टि डाल सके । परन्तु इसी एक कमजोरी के कारण समस्त भारत वर्ष ने कष्ट भोगा।

इन्हीं सब ऐतिहासिक तथ्यों का गहन अध्ययन-मनन करने पर पूज्य डॉक्टरजी ने विचार किया कि हमें अंग्रेजों से स्वतंत्रता तो शीघ्र ही मिलने वाली है किंतु उसके पश्चात भी यदि पुनः किसी बाहरी शक्ति ने आधिपत्य कर लिया तो..? भारत का युभोग्य तो वैसा ही बना रहेगा। यदि भविष्य में ऐसा होने से रोकना है तो जन-जन में राष्ट्र व अपनी संस्कृति के प्रति स्वत्व एवं गौरव की भावना का पुनर्जागरण करना अति आवश्यक है। जन-जन में राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करना आवश्यक है और यह सब करने के लिए एक निरंतर चलने वाली अच्छी शिक्षण पद्धति एवं संस्कार केन्द्रों की आवश्यकता होगी। इन्हीं सब विषयों के विश्लेषण के पश्चात उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संस्थापना का निर्णय किया।

संघ अपने संस्थापना दिवस से ही अपने ध्येय की प्राप्ति हेतु कार्यरत है। स्वतंत्र भारत में भी शासन द्वारा मिथ्यारोप लगाकर दो बार संघ पर प्रतिबंध लगाया गया किंतु संघ प्रत्येक बार और अधिक उत्कर्ष को प्राप्त करके पुन: आगे बढ़ा। वर्तमान में संघ हिंदू संस्कृति के पुनर्जागरण की धुरी बना हुआ है। भविष्य के भारत में सकल समाज संघ को हिन्दू संस्कृति एवं राष्ट्र जागरण के प्रणेता के रूप में देख रहा है और नेतृत्व की अपेक्षाएं रखता है। इस स्थिति में हम समस्त स्वयंसेवकों का भी यह दायित्व है कि अपनी योग्यता व क्षमता में उत्कृष्टता लाएं और इस राष्ट्र निर्माण के कार्य में समाज की अपेक्षाओं पर खरे उतरें ।

पांव में स्वातंत्र्य के क्यों हिचकिचाहट आ समायी
क्यों नवल तारुण्य में निर्वीर्यता देती दिखायी
आज रग रग में लहू का खौलता तूफान ला दे
ओ विजय के पर्व पौरूष का प्रखर सूरज उगा दे
पार्थ के गांडीव धारि हाथ का कम्पन छुड़ा है ।

विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं।।

रघुवीर सिंह

Dussehra 2021

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